लुप्त हो जाएगा आठवां बैकुंठ बद्रीनाथ : जानिये कब और कैसे! फिर यहां होगा भविष्य बद्री...


देश के चार प्रमुख धामों में से बद्रीनाथ धाम को एक माना जाता है। इस पौराणिक और भव्य मंदिर में भगवान श्रीहरी हिमालय पर्वत की श्रंखलाओं में विराजमान है। हिमालय की चोटियों के बीच स्थित इस पावन धाम का सनातन संस्कृति में बहुत महत्व है।बद्रीनाथ धाम समुद्र तल से 3,050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यहां पर पहुंचने का रास्ता भी काफी दुर्गम है।

बद्रीनाथ धाम : सृष्टि का आठवां बैकुंठ...

बद्रीनाथ धाम को सृष्टि का आठवां बैकुंठ माना जाता है। माना जाता है कि इस धाम में भगवान श्रीहरी छह माह तक योगनिद्रा में लीन रहते हैं और छह माह तक अपने द्वार पर आए भक्तों को दर्शन देते हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थित भगवान बद्रीविशाल की मूर्ति शालिग्राम शिला से बनी हुई चतुर्भुज अवस्था में और ध्यानमुद्रा में है।

मंदिर के पट बंद होने पर भी मंदिर में एक अखंड दीपक प्रज्वलित रहता है। इस देवस्थल का नाम बद्री होना भी प्रकृति से जुड़ा हुआ है। हिमालय पर्वत पर इस जगह जंगली बेरी बहुतायत में पाई जाती है। माना जाता है कि इन बेरियों की वजह से ही इस धाम का नाम बद्रीनाथ धाम पड़ा।

मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। अलकनंदा की सहचरणी नदी मंदाकिनी नदी के किनारे केदार घाटी है, जहां बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सबसे महत्वपूर्ण केदारेश्वर हैं। यह संपूर्ण इलाका रुद्रप्रयाग जिले का हिस्सा है। माना जाता है कि रुद्रप्रयाग में ही भगवान रुद्र का अवतार हुआ था।

इस दिन गायब हो जाएंगे बद्रीविशाल... बद्रीनाथ का जोशीमठ में स्थित नृसिंह भगवान की मूर्ति से खास जुड़ाव माना गया है। नृसिंह भगवान मूर्ति के सन्दर्भ में ऐसी मान्यता है कि आदिगुरू शंकराचार्य जी जिस दिव्य शालिग्राम पत्थर में नारायण की पूजा करते थे उसमें ऐकाएक भगवान नरसिंह भगवान की मूर्ति उभर आयी और उसी क्षण उन्हें नारायण के दर्शन के साथ अद्भूत ज्ञानज्योति प्राप्त हुई।

भगवान नारायण ने उन्हें नरसिंह रूप के रूद्र रूप की जगह शांत रूप का दर्शन दिया, तभी से लोक मंगलकारी नारायण का शांत रूप मूर्ति जन आस्था के रूप में विख्यात है। इसी पावन मंदिर में भगवान बदरीनाथ के कपाट बन्द हो जाने के बाद उनकी मूर्ति को जोशीमठ लाकर हिमकाल छः माह तक भगवान बदरीनाथ की पूजा भी इसी मंदिर में की जाती है।

मान्यता है कि जोशीमठ में स्थित नृसिंह भगवान की मूर्ति का एक हाथ साल-दर-साल पतला होता जा रहा है और अभी वर्तमान में भगवान नरसिंह भगवान के हाथ का वह हिस्सा सूई के गोलाई के बराबर रह गया है।

ऐसे में जिस दिन ये हाथ अलग हो जाएगा उस दिन नर और नारायण पर्वत (जय-विजय पर्वत) आपस में मिल जाएंगे और उसी क्षण से बद्रीनाथ धाम का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा। ऐसे में भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। पुराणों अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्यबद्री नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा।

फिर सामने आएंगे भविष्य बद्री...

इसके बाद भविष्य में बद्रीनाथ भगवान जोशीमठ से 22 किमी आगे भविष्य बद्री के रूप में प्रकट होकर दर्शन देंगे। स्थानीय लोंगों के अनुसार भविष्य बद्री के संदर्भ में लोगों की मान्यता के अनुरूप भविष्य बद्री में एक शिलाखण्ड पर आश्चर्यजनक रूप से भगवान विष्णु की मूर्ति भी आकारित हो रही है।

भविष्य के बद्रीनाथ भविष्य बद्री का मंदिर उपन में है, जो जोशीमठ से दूर पूर्व में लता की ओर है। यह तपोवन से दूसरी तरफ है और यहां धौलीगंगा नदी के ऊपर और लगभग 3 किलोमीटर के ट्रैक द्वारा पहुंचा जा सकता है मोटर सड़क से इसकी ऊंचाई 2744 मीटर है यह घने जंगलो के बीच स्थित है यहां पहुचने के लिए धौली नदी के किनारे का रास्ता काफी कठिन है धौलीगंगा का अर्थ होता है (सफेद पानी) और वास्तव में यह लगभग हर जगह तेज धारा के साथ तपोवन से ऊपर की तरफ से दोनों ओर लगभग सीधा चट्टानों के मध्य से तेजी से गुजरती है।

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