यहां हर रोज विश्राम करने आती हैं साक्षात् मां कालिका


दरअसल महाविद्याओंकी जननी हाटकाली की महाआरती के बाद शक्ति के पास महाकाली का बिस्तर लगाया जाता है और सुबह बिस्तर यह दर्शाता है कि मानों यहां साक्षात् कालिका विश्राम करके गयी हों, क्योंकि विस्तर में सलवटें पडी रहती हैं।

यहां आकर ही जगतगुरू शंकराचार्य ने स्वयं को माना था धन्य...

पुराने समय मे महाकालिका की अलौकिक महिमा के पास आकर ही जगतगुरू शंकराचार्य ने स्वयं को धन्य माना और मां के प्रति अपनी आस्था पुंज बिखेरते हुए उत्तराखण्ड क्षेत्र में अनेक धर्म स्थलों पर श्रद्वा के पुष्प अर्पित किए, जिनके प्रतीत चिन्ह आज भी जागेश्वर के मृत्युंजय महादेव मंदिर, पाताल भुवनेश्वर की रौद्र शक्ति पर व कालिका मंदिर के अलावा अन्य कई पौराणिक मंदिरों एवं गुफाओं में देखे जा सकते हैं।

आदि जगत गुरू शंकराचार्य से जुड़ी एक खास घटना... दरअसल छठी शताब्दी में आदि जगत गुरू शंकराचार्य जब अपने भारत भ्रमण के दौरान जागेश्वर आये तो शिव प्रेरणा से उनके मन में यहां आने की इच्छा जागृत हुई, लेकिन जब वे यहां पहुंचे तो नरबलि की बात सुनकर उद्वेलित शंकराचार्य ने इस दैवीय स्थल की सत्ता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और शक्ति के दर्शन करने से भी वे विमुख हो गए।

मान्यता के अनुसार इसके बाद जब विश्राम के उपरान्त शंकराचार्य ने देवी जगदम्बा की माया से मोहित होकर मंदिर शक्ति परिसर में जाने की इच्छा प्रकट की तो मंदिर शक्ति स्थल पर पहुंचने से ही कुछ दूर पूर्व तक ही स्थित प्राकृतिक रूप से निर्मित गणेश मूर्ति से आगे वे नहीं बढ़ पाये और अचेत होकर इस स्थान पर गिर पड़े व कई दिनों तक यही पड़े रहे उनकी आवाज भी अब बंद हो चुकी थी। अपने अंहभाव व कटु वचन के लिए जगत गुरू शंकराचार्य को अब अत्यधिक पश्चाताप हो रहा था। पश्चाताप प्रकट करने व अन्तर्मन से माता से क्षमा याचना के पश्चात मां भगवती की अलौकिक आभा का उन्हें आभास हुआ।

शंकराचार्य ने किया था कीलनं

चेतन अवस्था में लौटने पर उन्होंने महाकाली से वरदान स्वरूप प्राप्त मंत्र शक्ति व योगसाधना के बल पर शक्ति के दर्शन किए और महाकाली के रौद्रमय रूप को शांत किया तथा मंत्रोचार के द्वारा लोहे के सात बड़े-बड़े भदेलों से शक्ति को कीलनं कर प्रतिष्ठापित किया।

अष्टदल व कमल से मढवायी गयी इस शक्ति की ही पूजा अर्चना वर्तमान समय में यहां पर होती है। पौराणिक काल में प्रचलित नरबली के स्थान पर पशु बली की प्रथा लंबे समय तक यहां प्रचलित रही।

चमत्कारों से भरे इस महामाया भगवती के दरबार में सहस्त्रचण्डी यज्ञ, सहस्रघट पूजा, शतचंडी महायज्ञ, अष्टबलि अठवार का पूजन समय-समय पर आयोजित होता है। यही एक ऐसा दरबार है। जहां अमावस्या हो चाहे पूर्णिमा सब दिन हवन यज्ञ आयोजित होते हैं। मंदिर में अर्धरात्रि में भोग चैत्र और अश्विन मास की महाष्टमी को पिपलेत गांव के पंत उपजाति के ब्राह्मणों द्वारा लगाया जाता है। इस कालिका मंदिर के पुजारी स्थानीय गांव निवासी रावल उपजाति के लोग हैं।

डोला छूने से मिलता है दिव्य वरदान महाकाली के संदर्भ में एक प्रसिद्व किवदन्ति है कि कालिका का जब रात में डोला चलता है तो इस डोले के साथ कालिका के गण आंण व बांण की सेना भी चलती हैं। कहते है यदि कोई व्यक्ति इस डोले को छू ले तो दिव्य वरदान का भागी बनता है। हाट गांव के चौधिरयों द्वारा महाकालिका को चढायी गयी 22 नाली खेत में देवी का डोला चलने की बात कही जाती है।

महाआरती के बाद शक्ति के पास महाकाली का बिस्तर लगाया जाता है और सुबह बिस्तर यह दर्शाता है कि मानों यहां साक्षात् कालिका विश्राम करके गयी हों क्योंकि विस्तर में सलवटें पड़ी रहती हैं। कुछ बुजुर्ग बताते हैं पशु बलि महाकाली को नहीं दी जाती है। क्योंकि जगतमाता अपने पुत्रों का बलिदान नही लेती हैं। यह बलि कालिका के खास गण करतु को प्रदान की जाती है। मां काली के प्रति उनके तमाम किस्से आज भी क्षेत्र में सुने जाते है भगवती महाकाली का यह दरबार असंख्य चमत्कार व किवदन्तियों से भरा पड़ा है।

सेना की आस्था व विश्वास का केंद्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट में स्थित 'माँ कालिका मंदिर' जिसे पूरे कुमाऊँ क्षेत्र सहित भारतीय फौज की एक शाखा कुमाऊ रेजीमेंट की आस्था और विश्वास का केंद्र भी कहा जाता है, जो विश्वभर में प्रसिद्ध है। हाट कालिका माता के इस पावन मंदिर को भगवती माता मंदिर, हाट दरबार, महाकाली शक्तिपीठ आदि नामो से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने इस स्थान पर शक्ति पीठ की स्थापना की थी। गंगोलीहाट मुख्य बाजार से 1 किमी. की दूरी पर स्थित यह पावन दरबार चारों ओर से बड़े बड़े हरे-भरे देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ है।

महाआरती के बाद शक्ति के पास महाकाली का बिस्तर लगाया जाता है और सुबह बिस्तर यह दर्शाता है कि मानों यहां साक्षात् कालिका विश्राम करके गयी हों क्योंकि विस्तर में सलवटें पड़ी रहती हैं। कुछ बुजुर्ग बताते हैं पशु बलि महाकाली को नहीं दी जाती है। क्योंकि जगतमाता अपने पुत्रों का बलिदान नही लेती हैं। यह बलि कालिका के खास गण करतु को प्रदान की जाती है। मां काली के प्रति उनके तमाम किस्से आज भी क्षेत्र में सुने जाते है भगवती महाकाली का यह दरबार असंख्य चमत्कार व किवदन्तियों से भरा पड़ा है।

सेना की आस्था व विश्वास का केंद्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट में स्थित 'माँ कालिका मंदिर' जिसे पूरे कुमाऊँ क्षेत्र सहित भारतीय फौज की एक शाखा कुमाऊ रेजीमेंट की आस्था और विश्वास का केंद्र भी कहा जाता है, जो विश्वभर में प्रसिद्ध है। हाट कालिका माता के इस पावन मंदिर को भगवती माता मंदिर, हाट दरबार, महाकाली शक्तिपीठ आदि नामो से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने इस स्थान पर शक्ति पीठ की स्थापना की थी। गंगोलीहाट मुख्य बाजार से 1 किमी. की दूरी पर स्थित यह पावन दरबार चारों ओर से बड़े बड़े हरे-भरे देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ है।

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