माता सती की नाभि यहां गिरी थी! तब कहीं जाकर काली नदी के तट पर बना ये शक्तिपीठ


आज हम आपको उत्तरांचल में स्थित देवी मां के एक ऐसे शक्ति पीठ के बारे में बता रहे हैं। जिसे महाकाली की पीठ माना जाता है। वहीं यहां सती माता की नाभि गिरने का भी स्थान माना गया है। इसके साथ ही आज हम आपको बताएंगे कि आखिर इन शक्ति पीठों के अस्तित्व में आने की कहानी क्या है।

अत्यंत चमत्कारी इस शक्ति पीठ ( Purnagiri Mandir ) के संबंध में कहा जाता है कि अभी कुछ वर्षों पूर्व तक शाम होते ही यहां रूकना मना होता था, वहीं शाम के समय यहां से आने वाला सुमधुर संगीत बहुत कम व उन सिद्ध लोगों को ही सुनाई देता था जो यहां शाम के समय मौजूद रह जाते थे। लेकिन उनके लिए भी इस संगीत के स्थान तक पहुंचा मुमकिन न के बराबर था।

अत्यंत चमत्कारी व सिद्ध है पूर्णागिरी माता का मंदिर..

दरअसल पूर्णागिरी का मंदिर अन्नपूर्णा शिखर पर 5500 फीट की ऊंचाई पर है। कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की कन्या और शिव की अर्धांगिनी सती की नाभि का भाग यहां पर विष्णु चक्र से कट कर गिरा था।

प्रतिवर्ष इस शक्तिपीठ की यात्रा करने आस्थावान श्रद्धालु कष्ट सहकर भी यहां आते हैं। यह स्थान नैनीताल जनपद के पड़ोस में और चंपावत जनपद के टनकपुर से मात्र 17 किलोमीटर की दूरी पर है। "मां वैष्णो देवी" जम्मू के दरबार की तरह पूर्णागिरी दरबार में हर साल लाखों की संख्या में लोग आते हैं।

अत्यन्त दुरुह और खतरनाक रास्ता... यहां पहुंचने का रास्ता अत्यन्त दुरुह और खतरनाक है। क्षणिक लापरवाही अनन्त गहराई में धकेलकर जीवन समाप्त कर सकती है। नीचे काली नदी का कल-कल करता पानी स्थान की दुरुहता से हृदय में कम्पन पैदा कर देता है।

देवराज इन्द्र ने की थी तपस्या यहां... वहीं मंदिर के रास्ते में टुन्नास नामक स्थान पड़ता है, यहां पर देवराज इन्द्र ने तपस्या की, ऐसी भी जनश्रुती है। यहां ऊंची चोटी पर गाढ़े गए त्रिशुल आदि ही शक्ति के उस स्थान को इंगित करते हैं जहां सती का नाभि प्रवेश गिरा था।

पूर्णगिरी क्षेत्र की महिमा और उसके सौन्दर्य से एटकिन्सन भी बहुत अधिक प्रभावित था उसने लिखा है "पूर्णागिरी के मनोरम दृष्यों की विविधता एवं प्राकृतिक सौन्दर्य की महिमा अवर्णनीय है, प्रकृति ने जिस सर्वव्यापी वन सम्पदा के अधिर्वक्य से इस पर्वत शिखर पर स्वयं को अभिव्यक्त किया है, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका का कोई भी क्षेत्र शायद ही इसकी समता कर सके, किन्तु केवल मान्यता व आस्था के बल पर ही लोग इस दुर्गम घने जंगल में अपना पथ आलोकित कर सके हैं।"

नवरात्रियों पर आते हैं लाखों भक्त यहां हर नवरात्रि पर भक्तों के आने का सिलसिला जारी रहता है। सामान्यत: केवल नवरात्र में ही नहीं बल्कि हर मौसम में भक्त यहां आते हैं। वहीं शरद ॠतु की नवरात्रियों के स्थान पर यहां मेले का आनंद चैत्र की नवरात्रियों में ही अधिक लिया जा सकता है, क्योंकि वीरान रास्ता व इसमें पडऩे वाले छोटे-छोटे गधेरे मार्ग की जगह-जगह दुरुह बना देते हैं।

चैत्र की नवरात्रियों में लाखों की संख्या में भक्त अपनी मनोकामना लेकर यहाँ आते हैं। अपूर्व भीड़ के कारण यहाँ दर्शनार्थियों का ऐसा तांता लगता है कि दर्शन करने के लिए भी लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। मेला बैसाख माह के अन्त तक चलता है।

बाघ भी आता था यहां

बुजुर्गों के अनुसार कुछ वर्ष पहले तक यहां शाम होते ही एक बाघ(माता की सवारी) आ जाता था, जो माता के मंदिर के पास ही सुबह तक रूकता। इस कारण पूर्व में लोग शाम होते ही यह स्थान खाली कर देते। अभी भी रात में यहां जाना वर्जित माना जाता है। मान्यता है कि यहां रात के समय केवल देवता ही आते हैं।

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