इन उपायों से आपके घर में भी शीघ्र बज सकती है शहनाई


पहले कभी कम उम्र में ही हो जाने वाली शादियां अब एक निश्चित उम्र में होतीं हैं, इसको लेकर सरकार की ओर से बालिग होने के नियम भी बनाए गए हैं। जो ठीक भी हैं, लेकिन कई बार बालिग होने के बावजूद घर वालों को अपने बच्चों के लिए वर या वधु नहीं मिलती या यूं कहें कि उनके बच्चों की शादी ही नहीं हो पाती कभी कहीं कुंडली मिल भी जाए तो तमाम प्रकार के दोष के चलते रिश्ता बनने से पहले ही तोड़ना पड़ जाता है।

इसके चलते कई परिवारों में एक लंबी उम्र तक उनके बच्चे अविवाहित रह जाते हैं, यहां तक की कई बार तो शादी ही नहीं होती है। ऐसे में परिवार का मुखिया हो या उसकी पत्नी हमेशा ही इन कारणों के चलते तनाव में रहते हैं। ऐसे में चाहे घर का बेटा हो या बेटी दोनों के ही भविष्य को लेकर मां बाप परेशान रहने लगते हैं।

वहीं भारतीय समाज में तो बच्चियों को लेकर ज्यादा ही चिंता रहती है, यदि किसी की बेटी का एक उम्र तक विवाह नहीं हो तो कई बार आस-पड़ोस के लोग तक ताने देने लगते हैं।

जानकारों का भी मानना है कि एक आयु के साथ विवाह संबंधों का आना भी कम हो जाता है जिससे पूरा परिवार चिंतित रहता है। ऐसा नहीं है कि केवल युवती की शादी में ही परेशानियां आती है, कई बार युवकों का भी तमाम कोशिशों के बावजूद विवाह नहीं हो पाता। ऐसे में आज हम आपको युवक व युवती दोनों विवाह में हो रही परेशानियों से कैसे निजाद पा सकते हैं, इसके बारे में बता रहे हैं।

यदि आपके घर में भी विवाह को लेकर किसी भी प्रकार की देरी हो रही हो, तो इसके निदान के कई उपाय हैं। उपाय आपके कार्य को पूर्ण करने में सहायक होंगे। इसके तहत युवती और युवक के लिए अलग अलग उपाय हैं। जो इस प्रकार हैं...

चुकिं आगामी चंद दिनों में चैत्र नवरात्रि आनी है तो पहला उपाय युवती के लिए इन्हीं नवदुर्गा में छिपा हुआ है, इसके अनुसार...

नवरात्रि की छठवीं माता: कात्यायनी माता की अराधना : विवाह नहीं होने की स्थिति में या किसी तरह की रुकावट आने पर मां कात्यायनी की आराधना भी इस परेशानी से निजाद दिलाती है। इसके तहत माता कात्यायनी की आराधना करने के लिए प्रात:काल स्नानादि के बाद माता के इस मंत्र से जाप का संकल्प लें...

मंत्र : कात्यायनी महामये महायोगिन्यधीश्वरी नंद गोप सुतं देहि पतिं में कुरुते नम:।। माता के मंत जाप के लिए 1माला, 5 माला या 10 माला प्रतिदिन एक समान गिनती में जाप करें। मंत्र की संख्या 1 लाख 8 हजार या कार्य पूर्ण होने तक अपनी सामथ्रर्यनुसार संकल्प कर सकते हैं। संकल्पित मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद या विवाह के बाद यज्ञ(हवन) द्वारा मंत्र जाप का उद्यापन करें।

( सबसे जरूरी: इन सभी उपायों के दौरान इस बात का खास ध्यान रखें कि ये पूरी श्रृद्धा और विश्वास के साथ किए जाएं। ) युवती के लिए : ये हैं अचूक उपाय:- 1. माता वैभव लक्ष्मी की आराधना... इसके तहत माता वैभवलक्ष्मी के 5,7 या 11 शुक्रवार के व्रत का संकल्प लें। इन तीन संख्याओं में से आप किसी भी इच्छित संख्या का संकल्प ले सकती हैं।

इसके बाद पूरी श्रृद्धा और विश्वास के साथ इन व्रतों को करें। व्रत पूर्ण हो जाने पर व्रत का उद्यापन करें। इसमें भी 5,7 या 11 सुहागन स्त्रियों या कन्याओं को भोजन कराएं और वैभवलक्ष्मी की पुस्तकें बांटे साथ ही सुहागन स्त्रियों को सुहाग सामग्री का दान करें।

2. गौरा माता की अराधना... विवाह में आ रही बाधा को दूर करने के लिए एक अन्य अचूक उपाय गौरा (गौरी) माता की आराधना करना है। इसके तहत गौरी माता की अराधना का विवरण रामायण में भी मिलता है। माता सीता ने विवाह से पूर्व गौरा माता की अराधना कर श्रीराम जी को वर रूप में प्राप्त किया था।

ऐसे करें गौरा माता की अराधना- इस आराधना के लिए प्रात:काल स्नान कर गौरी माता के चित्र को सामने रखकर रामचरित मानस के बालकांड में से ये चौपाई छंद का नित्य पाठ करें। 51 दिन तक इसका पाठ करना उचित माना जाता है।

''जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥ नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥ भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥

पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥ सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥ देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥ मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥ कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस-कहि चरन गहे बैदेहीं॥

बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥ सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥ सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥ नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥4॥


छन्द : - मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥ एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥ सोरठा : - जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥236॥

( भावार्थ:- हे श्रेष्ठ पर्वतों के राजा हिमाचल की पुत्री पार्वती! आपकी जय हो, जय हो, हे महादेवजी के मुख रूपी चन्द्रमा की (ओर टकटकी लगाकर देखने वाली) चकोरी! आपकी जय हो, हे हाथी के मुख वाले गणेशजी और छह मुख वाले स्वामिकार्तिकजी की माता! हे जगज्जननी! हे बिजली की सी कान्तियुक्त शरीर वाली! आपकी जय हो!

:- आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं।

:- पति को इष्टदेव मानने वाली श्रेष्ठ नारियों में हे माता! आपकी प्रथम गणना है। आपकी अपार महिमा को हजारों सरस्वती और शेषजी भी नहीं कह सकते ।

:- हे (भक्तों को मुंहमांगा) वर देने वाली! हे त्रिपुर के शत्रु शिवजी की प्रिय पत्नी! आपकी सेवा करने से चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवी! आपके चरण कमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं।

:- मेरे मनोरथ को आप भलीभांति जानती हैं, क्योंकि आप सदा सबके हृदय रूपी नगरी में निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजी ने उनके चरण पकड़ लिए।

:- गिरिजाजी सीताजी के विनय और प्रेम के वश में हो गईं। उन (के गले) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुस्कुराई। सीताजी ने आदरपूर्वक उस प्रसाद (माला) को सिर पर धारण किया।

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